पाकिस्तान के एक मशहूर टीवी चैनल एआरवाई डिजिटल ने हाल ही में एक नया ड्रामा सीरीज़ लॉन्च किया, जिसका नाम है ‘शेर’ (Sher), इस ड्रामा में मुख्य भूमिका निभाई है दानिश तैमूर (Danish Taimoor) और सारा खान (Sara Khan) ने. कहानी दो प्रेमियों की है- शेर ज़मान और फजर. ये दोनों अलग-अलग परिवारों से हैं, जो सालों से एक-दूसरे से दुश्मनी रखते हैं. इनके प्यार की राह में पुरानी दुश्मनी, समाज की रुकावटें और परिवार की जिद जैसी कई मुश्किलें आती हैं. शुरू में तो सबको लगा कि ये एक आम रोमांटिक ड्रामा है, जो लोगों को पसंद आएगा. लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि ये शो इतना बड़ा विवाद खड़ा कर देगा और पुलिस केस तक की नौबत आ जाएगी.
ड्रामा की एक खास कहानी ने लोगों को गुस्सा दिला दिया. इसमें दिखाया गया है कि एक सैयद लड़की (जो पैगंबर मुहम्मद साहब के परिवार से बताई जाती है) की शादी एक गैर-सैयद लड़के से हो रही है. पाकिस्तान के शिया समुदाय के कुछ लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर सके. उनके हिसाब से सैयद लोग बहुत पवित्र होते हैं, क्योंकि ये पैगंबर साहब के पोते हसन और हुसैन के वंशज हैं. ऐसे में सैयद लड़की का गैर-सैयद लड़के से शादी करना उनके लिए अपमान जैसा लगा.
सम्मान को ठेस पहुंचा रहा है
सिंध प्रांत के दादू जिले में शिया कार्यकर्ताओं ने चैनल के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. ये शिकायत 6 अक्टूबर को की गई. इसमें कहा गया कि ड्रामा सैयद परिवार की पवित्रता और सम्मान को ठेस पहुंचा रहा है. ये ईशनिंदा (धर्म की बेइज्जती) जैसा है. पुलिस ने एफआईआर (पहली सूचना रिपोर्ट) दर्ज कर ली. इसमें चैनल के बड़े अधिकारी (सीईओ), ड्रामा के निर्देशक और लेखकों को आरोपी बनाया गया. कानून की दो धाराएं लगाई गईं. धारा 295A: अगर कोई जानबूझकर किसी धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, तो ये जुर्म है. धारा 298A: इस्लाम के सम्मानित लोगों के खिलाफ बुरी बातें कहना या करना गुनाह है. पाकिस्तान में ईशनिंदा के केस बहुत गंभीर होते हैं. यहां तक कि फिल्में, किताबें या टीवी शो पर भी ऐसे आरोप लग जाते हैं, और कभी-कभी लोगों की जान तक पर बन आती है.
लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रही?
जब ये खबर सोशल मीडिया पर फैली, तो पाकिस्तान भर में हंगामा मच गया. एक्स और रेडिट जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग तरह-तरह की बातें करने लगे. कुछ लोग गुस्से में थे, तो ज्यादातर लोग हैरान और मजाक उड़ा रहे थे. एक व्यक्ति ने मजाक में लिखा, ‘पाकिस्तान में तो अरब देशों से ज्यादा सैयद लोग रहते हैं लगता है.’ दूसरे ने कहा, ‘ये ईशनिंदा कैसे हो गई?. जवाब में किसी ने लिखा, ‘पाकिस्तानी तरीके से.’ रेडिट पर एक यूजर ने टिप्पणी की ऐसा लगता है जैसे कोई सोकर उठा और ड्रामा से पैसे कमाने का आईडिया आया, अब विवाद पैदा कर दिया.’ हंसी-मजाक के पीछे एक गंभीर बात छिपी है. ये विवाद बताता है कि पाकिस्तान में जाति, परिवार की लाइन और धर्म की दीवारें कितनी मजबूत हैं. देश का संविधान कहता है कि सब बराबर हैं, लेकिन असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता. लोग खुलकर इन मुद्दों पर बात नहीं करते, लेकिन ये ड्रामा ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया.
‘सैयदवाद’ क्या है?
पाकिस्तान में इसका मतलब समझें सैयदवाद एक तरह की सोच है, जिसमें सैयद लोगों को सबसे ऊपर का दर्जा दिया जाता है. सैयद वो लोग हैं जो खुद को पैगंबर मुहम्मद साहब के परिवार से जोड़ते हैं. पैगंबर साहब के दो पोते थे हसन और हुसैन. हसन के बच्चों को शरीफ कहते हैं, और हुसैन के बच्चों को सैयद. सदियों से सैयद लोगों को बहुत सम्मान मिलता आया है. वो धार्मिक रूप से पवित्र माने जाते हैं, और समाज में भी ऊंचा स्थान रखते हैं. पाकिस्तानी मुस्लिम समाज को दो बड़े हिस्सों में बांटा जाता है- अशरफ: ये अमीर और कुलीन लोग हैं. ये कहते हैं कि उनके पूर्वज अरब, ईरान या मध्य एशिया से आए थे. इसमें सैयद सबसे ऊपर हैं, फिर पठान, मुगल और शेख. अजलाफ: ये स्थानीय लोग हैं, जिनके पूर्वज हिंदू थे और बाद में मुस्लिम बने. ये व्यापारी, कारीगर वगैरह होते हैं. सबसे नीचे पसमांदा समुदाय है, पसमांदा का मतलब फारसी में ‘पीछे छूट गए लोग’. ये पाकिस्तान के मुस्लिमों का बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन इनके पास ताकत या पैसा कम है. इस्लाम कहता है कि सब बराबर हैं, कोई जाति नहीं, लेकिन फिर भी ये फर्क बने हुए हैं. शादी-ब्याह में, मस्जिद में बैठने में, और रोज की जिंदगी में ये दीवारें दिखती हैं.
पाकिस्तान में जाति की जड़ें कितनी गहरी हैं?
पाकिस्तान में जातिवाद कोई छोटी बात नहीं है, ये शहरों से लेकर गांवों तक हर जगह है. साल 2020 में अल जजीरा न्यूज में एक लेख आया था. इसमें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर शाइस्ता पटेल ने बताया कि पाकिस्तान सरकार आधिकारिक तौर पर 40 जातियों को मानती है. इनमें से 32 को 1957 में एक कानून के तहत ‘अनुसूचित जाति’ कहा गया था. लेकिन अच्छी बात ये थी कि इनके लिए सरकारी नौकरियों में 6% जगह रखी गई थी. बुरी बात ये कि 1990 के दशक में ये कोटा खत्म कर दिया गया. अब इन लोगों को नौकरी या सुरक्षा नहीं मिलती. एक पत्रकार जुल्फिकार शाह ने 2007 में रिपोर्ट की थी कि जाति के कारण लोग अलग-अलग खाना खाते हैं, एक-दूसरे को गालियां देते हैं, जमीन छीनते हैं, मारपीट करते हैं, और कभी-कभी लड़कियों पर जुल्म करते हैं. ऊंची जाति वाले कहते हैं कि निचली जाति वाले ‘गंदा’ खाना खाते हैं, इसलिए वो अशुद्ध हैं. भले ही कोई हिंदू से मुस्लिम बन जाए, जाति का ठप्पा नहीं मिटता. ये सिर्फ नाम बदल जाता है, लेकिन फर्क बना रहता है.
दक्षिण एशिया के इस्लाम में जाति कैसे काम करती है?
ये सब बहुत पुराना है, जब इस्लाम दक्षिण एशिया में आया, तो बाहर से आए लोग (अरब, तुर्क) खुद को स्थानीय लोगों से अलग रखना चाहते थे. धीरे-धीरे अशरफ और अजलाफ जैसे नाम बने. इस्लाम कहता है जाति गलत है, लेकिन लोग इसे मानते नहीं. मशहूर नेता बी.आर. अंबेडकर ने अपनी किताब में लिखा था, ‘मुसलमानों में गुलामी तो खत्म हो गई, लेकिन जाति बनी हुई है. मुस्लिम समाज हिंदू समाज जितना ही बुराइयों से भरा है आज भी यही होता है. बीबीसी की 2016 रिपोर्ट में बताया गया कि निचली जाति के मुस्लिमों को मस्जिद में अलग बैठाया जाता है, स्कूल में भेदभाव होता है, और कब्रिस्तान भी अलग होते हैं. कुछ जगहों पर सफाई करने वालों के लिए अलग पानी का गिलास रखा जाता है. भारत और पाकिस्तान में पसमांदा आंदोलन चल रहा है. ये लोग कहते हैं कि मुस्लिम समाज में भी सबको बराबर मौका मिलना चाहिए. भेदभाव को मान्यता दो और रोकने के लिए कानून बनाओ.

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