Sharmistha Panoli , सोशल मीडिया के दौर में जब एक पोस्ट देशभर में बवाल खड़ा कर सकती है, ऐसे में एक युवा इंफ्लुएंसर की गिरफ्तारी और फिर अदालत से मिली राहत ने देशभर में बहस छेड़ दी है।

हम बात कर रहे हैं 22 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली की, जिन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट ने अंतरिम ज़मानत दे दी है।उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने एक ऐसा इंस्टाग्राम वीडियो पोस्ट किया जिसमें पैगंबर मोहम्मद और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी। इस वीडियो को लेकर काफी नाराज़गी फैली और इसके बाद मामला कानूनी स्तर तक जा पहुंचा।
🔍 पूरा मामला क्या है?
15 मई को कोलकाता के गार्डन रीच थाना क्षेत्र में एक FIR दर्ज हुई, जिसमें शर्मिष्ठा पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने का आरोप लगा। इसके बाद 17 मई को कोर्ट से वारंट जारी हुआ और पुलिस ने उन्हें 30 मई को गुरुग्राम से गिरफ्तार किया।उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें कोलकाता लाया गया, जहां उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।
⚖️ क्या है कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला ?
गुरुवार को हाई कोर्ट के जज राजा बसु चौधरी ने शर्मिष्ठा को अंतरिम राहत दी। उन्हें ₹10,000 के बेल बॉन्ड पर जमानत दी गई, साथ ही कुछ कड़ी शर्तें भी रखी गईं:
बिना अनुमति के देश नहीं छोड़ सकतीं।
जांच में पूरा सहयोग देना होगा।
कोर्ट की अनुमति के बिना मीडिया से बात नहीं करेंगी।
धमकियों को देखते हुए उन्हें पुलिस सुरक्षा भी दी
👨👩👧 परिवार का बयान: ‘बेटी को सबक मिल गया है’
उनके पिता पृथ्वीराज पनोली ने मीडिया से बात करते हुए कहा,
“मेरी बेटी कानून की छात्रा है, लेकिन उसकी एक गलती ने उसे जेल पहुंचा दिया। मैं उम्मीद करता हूं कि अब उसे समझ आ गया होगा कि सोशल मीडिया पर बोलते समय कितनी ज़िम्मेदारी ज़रूरी है।”
उन्होंने यह भी बताया कि शर्मिष्ठा को ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और किडनी की बीमारी भी है, जिससे वह मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान रहती हैं।
बीजेपी विधायक अग्निमित्रा पॉल ने शर्मिष्ठा का समर्थन करते हुए शिकायतकर्ता वजाहत खान पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि,> “अगर कोई मुस्लिम युवक हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ बोलता है तो उस पर भी वैसी ही कार्रवाई होनी चाहिए जैसी शर्मिष्ठा पर हुई।”
इंफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली की गिरफ्तारी और ज़मानत से साफ है कि सोशल मीडिया की ताक़त जितनी बड़ी है, उतनी ही ज़िम्मेदारी भी मांगती है। यह मामला आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए एक उदाहरण बन सकता है कि डिजिटल आज़ादी का मतलब गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं है।
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